1459 CE में राव जोधा द्वारा निर्मित · भारत का सबसे विशाल किला · 150 मी. ऊँचाई
सबसे ज़रूरी जानकारी, एक जगह पर
1459 से आज तक — 565 साल का गौरवशाली इतिहास
राव जोधा ने मंडोर से अपनी राजधानी स्थानांतरित करने का निर्णय किया। 12 मई 1459 को चिड़ियाटूंक पहाड़ी पर किले की नींव रखी गई। स्थानीय मान्यता के अनुसार, नींव रखते समय एक तपस्वी चीला नाथ जी को पहाड़ी से हटाया गया था, जिन्होंने जोधपुर को सूखे की श्राप दी थी — इसीलिए यहाँ पानी की कमी रहती है।
राव जोधा के उत्तराधिकारियों ने किले का विस्तार जारी रखा। राव सूजा और राव गांगा के शासन में नए महलों और दरवाज़ों का निर्माण हुआ। किले की ऊँची दीवारें — कहीं-कहीं 120 फीट ऊँची और 70 फीट मोटी — इसी काल में बनी।
राव मालदेव जोधपुर के सबसे शक्तिशाली शासक थे। उनके शासन में किले का सबसे अधिक विस्तार हुआ। मोती महल और फूल महल का निर्माण इसी काल में शुरू हुआ। 1544 में शेर शाह सूरी के हमले के बावजूद किला अजेय रहा।
महाराजा उदय सिंह के समय से राठौड़ों ने मुगल साम्राज्य के साथ मैत्री संबंध स्थापित किए। अकबर के दरबार में जोधपुर के राजपूत महत्वपूर्ण पदों पर रहे। इस काल में मुगल और राजपूत स्थापत्य कला का अद्भुत मिश्रण किले में देखने को मिला।
महाराजा अजीत सिंह ने औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद 1707 में मुगल शासन से स्वतंत्रता प्राप्त की। उन्होंने किले में नई इमारतें बनवाईं और जोधपुर को एक स्वतंत्र राज्य के रूप में पुनः स्थापित किया। यह काल मारवाड़ के इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय है।
ब्रिटिश शासन के दौरान जोधपुर एक महत्वपूर्ण रियासत रही। महाराजा हनवंत सिंह ने किले और महलों का जीर्णोद्धार करवाया। 1947 में भारत की स्वतंत्रता के बाद महाराजा हनवंत सिंह ने भारतीय संघ में विलय किया।
1972 में मेहरानगढ़ म्यूजियम ट्रस्ट की स्थापना हुई। आज यह भारत के सर्वश्रेष्ठ किला-संग्रहालयों में से एक है। RIFF (Rajasthan International Folk Festival) यहाँ हर वर्ष आयोजित होता है। 2007 में इसे UNESCO विश्व धरोहर की Tentative List में शामिल किया गया।
हर दरवाज़े की अपनी कहानी — युद्ध, विजय और इतिहास
निर्माण: 1806 CE · महाराजा मान सिंह
जयपोल जोधपुर के मुख्य प्रवेश द्वार है। इसका निर्माण 1806 में जयपुर और बीकानेर पर विजय के उपलक्ष्य में हुआ। "जय" शब्द विजय का प्रतीक है।
निर्माण: 1707 CE · महाराजा अजीत सिंह
मुगल सेना पर विजय के बाद बना यह दरवाज़ा "फ़तेह" (विजय) का प्रतीक है। इसके ऊपर तोपों के निशान और युद्ध के चिह्न अभी भी दिखते हैं।
15वीं शताब्दी
इस दरवाज़े पर सती की हथेलियों के निशान (हस्त चिह्न) बने हुए हैं — महाराजाओं की मृत्यु पर उनके साथ सती होने वाली रानियों के। यह भावनात्मक रूप से सबसे प्रभावशाली स्थान है।
15वीं-16वीं शताब्दी
भगवान भैरव को समर्पित यह द्वार किले की सुरक्षा का प्रतीक था। यहाँ की दीवारों पर तोप के गोलों के निशान हैं जो पुराने आक्रमणों की याद दिलाते हैं।
16वीं शताब्दी
सूर्य देव को समर्पित यह द्वार पूर्व दिशा में है। सुबह के समय जब सूरज की किरणें इस द्वार पर पड़ती हैं तो यह अद्भुत दृश्य प्रस्तुत करता है — फोटोग्राफी के लिए बेस्ट स्पॉट।
16वीं-17वीं शताब्दी
मक्का की दिशा में बना यह द्वार मुगल-राजपूत सह-अस्तित्व का प्रतीक है। इसकी वास्तुकला में मुगल शैली का स्पष्ट प्रभाव दिखता है — मेहराब और जटिल नक्काशी।
15वीं शताब्दी
लोहे से बना यह अंतिम और सबसे सुरक्षित द्वार है। इसमें नुकीले कील लगे हुए थे जो हाथियों को रोकने के काम आते थे। यह किले का सबसे पुराना और मूल द्वार है।
राजपूत स्थापत्य का उत्कर्ष — हर महल एक अद्वितीय रचना
मोती महल मेहरानगढ़ का सबसे विशाल और भव्य दर्शक कक्ष है। यहाँ पाँच छुपी हुई अलकोव (niches) हैं जहाँ से रानियाँ बिना दिखे दरबार की कार्यवाही देख सकती थीं। छत पर शीशे का अद्भुत काम (mirrored ceiling) और दीवारों पर जटिल भित्तिचित्र हैं। महाराजा यहाँ प्रजा से मिलते और फैसले सुनाते थे।
महाराजा अभय सिंह द्वारा 18वीं सदी में निर्मित फूल महल किले का सबसे रंगीन महल है। इसकी छत पर सोने की परत चढ़ी है (gilt ceiling) और दीवारों पर फूलों की नक्काशी है। यहाँ रागमाला चित्रावली की अद्भुत पेंटिंग हैं जो भारतीय संगीत के रागों को दर्शाती हैं। यह निजी उत्सव और नृत्य के लिए उपयोग होता था।
शीश महल की दीवारें और छत रंगीन काँच और दर्पणों से जड़ी हुई हैं। जब दीपक जलाए जाते थे तो पूरा महल तारों से भरे आसमान जैसा चमकता था। यह कमरा शाही विश्राम और निजी उत्सव के लिए बना था। शीशे का काम इतना बारीक है कि आज भी देखने वाले दंग रह जाते हैं।
झाँकी महल महिलाओं का अंतःपुर था। यहाँ की खिड़कियों से रानियाँ बाहर की दुनिया देख सकती थीं बिना खुद दिखे। महल में बच्चों के खिलौनों का अद्भुत संग्रह है — राजपूत शाही परिवारों के बच्चों के पालने, हाथीदाँत के खिलौने और राजशाही झूले आज भी यहाँ सुरक्षित हैं।
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